नींद में बोलना या चलना क्या कोई बीमारी है? जानिए इससे जुड़ी अहम बातें

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आपने कभी देखा होगा कि आपके साथ सोया हुआ व्यक्ति अचानक नींद में कुछ बोलने लगता है, बड़बड़ाने लगता है. ऐसे लोगों को अंग्रेज़ी में ‘स्लीप टॉकर’ कहते हैं.

कभी-कभी ये बातें इतनी अजीब या निजी होती हैं कि रिश्तों में बेवजह की कड़वाहट या ग़लतफ़हमी पैदा कर देती हैं. इसे मेडिकल भाषा में ‘सोम्निलोकी’ कहा जाता है.

नींद में बड़बड़ाना सिर्फ़ सुनने वाले की नींद नहीं ख़राब करता है, बल्कि बोलने वाले की सेहत के बारे में भी बहुत कुछ कहता है.

अधिकतर मामलों में नींद में बोलना एक सामान्य स्थिति मानी जाती है, लेकिन अगर आपकी बड़बड़ाहट की फ्रीक्वेंसी (बार-बार बोलना) बढ़ गई है, तो इसे नज़रअंदाज़ करना भारी पड़ सकता है.

यहां तक कि कई लोग बड़बड़ाने के साथ-साथ हाथ-पैर चलाने लगते हैं या चीखते-चिल्लाते हैं.

नींद में बोलने के अलावा कुछ लोगों को इसमें चलने की भी आदत होती है. बोलने के मुक़ाबले नींद में चलना ज़्यादा ख़तरनाक हो सकता है.

आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है और इससे बचने के क्या उपाय हैं.

नींद में बोलना

नींद में बोलना उन लोगों में देखा जा सकता है जो तनाव में सोते हैं (सांकेतिक तस्वीर)

जब हम सोते हैं, तो दिमाग में एक तरह का सुरक्षा तंत्र काम करता है. यह सपनों से जुड़ी तंत्रिका गतिविधियों को बोलने या शरीर की हरकतों में बदलने से रोकता है.

लेकिन यह सिस्टम पूरी तरह परफेक्ट नहीं होता. कभी-कभी कुछ संकेत ‘लीक’ हो जाते हैं.

इसी वजह से नींद में बड़बड़ाना, कराहना, साफ़-साफ़ बोलना और कभी-कभी स्लीपवॉकिंग हो सकती है.

विशेषज्ञों के अनुसार, यह कई शारीरिक और मानसिक कारणों से जुड़ा हो सकता है.

तनाव, अवसाद, नींद की कमी, शराब का सेवन और बुख़ार जैसी स्थितियां नींद में बोलने की संभावना बढ़ा सकती है.

दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल के डॉक्टर मोहसिन वली कहते हैं कि नींद में बोलना आम तौर पर किसी बड़ी बीमारी का लक्षण नहीं होता. लेकिन यह तनाव से जुड़ा हो सकता है.

वह बताते हैं, “नींद में बोलना उन लोगों में देखा जा सकता है जो तनाव में सोते हैं या दिन भर के काम को ज़रूरत से ज़्यादा अपने दिल पर ले लेते हैं. ऐसे लोग कई बार वही बातें नींद में भी बोलने लगते हैं.”

इसमें व्यक्ति सोते-सोते कुछ भी बोल सकता है और कई बार सपने में डर लगने पर भी बोलने लगता है.

डॉक्टरों के अनुसार इसका कोई अलग से इलाज नहीं होता, बल्कि इसके पीछे की वजह को समझना ज़रूरी होता है.

नींद में बोली जाने वाली बातें अक्सर व्याकरण के हिसाब से सही होती हैं. हाल की घटनाओं या अनुभवों से जुड़ी हो सकती हैं, लेकिन कई बार अजीब और बेतुकी भी लगती हैं.

ज़्यादातर मामलों में नींद में बोलना कोई बीमारी नहीं है. हालांकि तनाव, मानसिक दबाव या मनोवैज्ञानिक समस्याएं इसकी संभावना को बढ़ा सकती हैं.

मेट्रो ग्रुप ऑफ़ हॉस्पिटल्स की सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर सोनिया लाल गुप्ता बताती हैं कि रात में नींद के दौरान बोलना एक आम समस्या है, जो ख़ासतौर पर बच्चों में ज़्यादा देखी जाती है. साथ ही वह कहती हैं कि अगर यह समस्या बढ़ जाए तो चिंता करने की बात है.

नींद में चलना

 

नींद में चलना (सांकेतिक तस्वीर)
नींद में बोलना आम तौर पर बीमारी नहीं, लेकिन नींद में चलने पर हादसे का ख़तरा हो सकता है

नींद में चलना ख़तरनाक हो सकता है. अमेरिका के लुइसियाना राज्य में रहने वाली एक बच्ची पेटन 14 सितंबर साल 2024 की रात नींद में अपने घर से बाहर निकल गईं और चलते-चलते जंगल के बीच पहुंच गईं.

बच्ची के गायब होने पर घरवालों ने पुलिस को सूचना दी, और फिर बच्ची की तलाश शुरू हुई. जब बच्ची कहीं भी आसपास नहीं मिली तो इसके लिए ड्रोन कैमरे की मदद ली गई.

डॉक्टर मोहसिन वली भी मानते हैं कि नींद में बोलना आम तौर पर बीमारी नहीं, लेकिन नींद में चलने पर हादसे का ख़तरा हो सकता है.

उनके मुताबिक़, “इसमें व्यक्ति सच में उठकर चलने लगता है और उसे इसका पता भी नहीं होता. ऐसे में गिरने या किसी चीज़ से टकराने का ख़तरा रहता है. अगर कोई छत पर सो रहा हो तो गिरने की आशंका भी हो सकती है.”

डॉक्टर वली अपने छात्र जीवन का एक अनुभव भी बताते हैं. वह कहते हैं कि 1968 में हाई स्कूल के दौरान विज्ञान के पेपर से पहले वह बहुत तनाव में थे और रात में सोने के बाद सुबह चार बजे के आसपास उठकर चलने लगे थे. उस समय उनके पिता ने उन्हें रोक लिया था.

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विशेषज्ञों के मुताबिक़ रात की नींद कई चरणों में पूरी होती है.

जब हम सोने की कोशिश करते हैं, तो सबसे पहले हल्की नींद आती है. क़रीब 20 मिनट बाद यह नींद धीरे-धीरे गहरी होने लगती है.

इसके बाद नींद फिर कुछ समय के लिए हल्की होती है और फिर इंसान बहुत गहरी नींद में चला जाता है, जिसे रैपिड आई मूवमेंट (आरईएम) कहा जाता है.

नींद के ये सभी चरण पूरी रात में कई बार दोहराए जाते हैं. हर चक्र के साथ आरईएम यानी बहुत गहरी नींद की अवधि बढ़ती जाती है और यही सिलसिला सुबह नींद खुलने तक चलता रहता है.

आरईएम नींद के दौरान ही हम सबसे ज़्यादा सपने देखते हैं. इस अवस्था में शरीर लगभग पूरी तरह शिथिल रहता है, ताकि सपनों में चल रही गतिविधियों के अनुसार शरीर असल में हरकत न करने लगे.

हालांकि नींद में चलने की समस्या तब होती है जब दिमाग और शरीर के बीच तालमेल बिगड़ जाता है. यह एक तरह की भ्रम की स्थिति होती है, जिसमें दिमाग इतना सक्रिय होता है कि वह शरीर को चलने-फिरने के संकेत देता है, लेकिन इतना सक्रिय नहीं होता कि व्यक्ति पूरी तरह जाग सके.

इटली के मिलान स्थित निगुआरडा अस्पताल में हुए एक अध्ययन में नींद में चलने वाले लोगों के दिमाग की गतिविधियों का अध्ययन किया गया. शोध में पाया गया कि ऐसे लोगों के दिमाग के कुछ हिस्से उस समय सक्रिय रहते हैं, जबकि बाकी हिस्से नींद की अवस्था में होते हैं.

यह अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि नींद में चलने की समस्या नींद और जागने की अवस्थाओं के बीच पैदा हुए असंतुलन का नतीजा होती है.

कब करें चिंता?

सांकेतिक तस्वीर
ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया होने पर नींद के दौरान दिमाग़ तक ऑक्सीजन ठीक से नहीं पहुंचती है

डॉक्टर सोनिया लाल गुप्ता के मुताबिक़, नींद में बोलने की स्थिति में ज़्यादा चिंता की ज़रूरत नहीं होती. वो कहती हैं, ”नींद में बोलने या बड़बड़ाने वाले लोगों को अक्सर सुबह यह याद नहीं रहता कि उन्होंने रात में क्या कहा था. ज़्यादातर मामलों में, विशेषकर बच्चों में, इलाज की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या अपने-आप ख़त्म हो जाती है.”

डॉक्टर गुप्ता कहती हैं कि वयस्कों में यह देखना ज़रूरी होता है कि नींद में बोलने की वजह क्या है और क्या इससे नींद की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है.

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वो कहती हैं कि अगर किसी व्यक्ति को बार-बार नींद में बोलने, चिल्लाने या हिंसक हरकतें करने की समस्या हो और इससे उसकी नींद डिस्टर्ब हो रही हो, तो इसकी वजह की जांच ज़रूरी है.

डॉक्टर वली के मुताबिक़ आजकल समाज में बहुत से लोग नींद की कमी से जूझ रहे हैं. कुछ लोगों में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया भी पाया जाता है, जिसमें नींद के दौरान दिमाग़ तक ऑक्सीजन ठीक से नहीं पहुंचती और इससे दिमाग तनाव में चला जाता है.

उनका कहना है कि नींद में चलने या नींद में बोलने की समस्या तनाव, नींद की कमी, चिंता या किसी बीमारी के बाद भी हो सकती है.

इलाज

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सोने और जागने का समय तय होना चाहिए. दोपहर में तीन बजे के बाद कैफीन का सेवन नहीं करना चाहिए

सोने का टाइम-टेबल नियमित ना होने या कई बार स्ट्रेस की वजह से भी आप इसके शिकार हो सकते हैं. डॉक्टर्स सलाह देते हैं कि इन चीज़ों को ठीक कर लेने से आप इसस परेशानी को दूर कर सकते हैं.

डॉक्टर सोनिया लाल गुप्ता नींद की गुणवत्ता बेहतर करने को लेकर कहती हैं, “सोने और जागने का समय तय होना चाहिए. दोपहर तीन बजे के बाद कैफीन का सेवन नहीं करना चाहिए और सोने से पहले मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल से बचना चाहिए.”

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उन्होंने कहा, “अगर कोई व्यक्ति ज़्यादा तनाव के साथ सोने जाता है और यही समस्या बढ़ रही है, तो डॉक्टर से दिखाना ज़रूरी है.

डॉ. गुप्ता यह भी बताती हैं कि अगर नींद के दौरान कोई व्यक्ति हिंसक हरकतें करता है, जैसे सोते समय पार्टनर को लात मार देना, तो यह किसी न्यूरोलॉजिकल समस्या का संकेत हो सकता है.

उन्होंने कहा, “बच्चों में नींद से जुड़ी ऐसी शिकायतें ज़्यादा इसलिए होती हैं क्योंकि उनका दिमाग़ अभी विकसित हो रहा होता है. हालांकि, अगर बच्चा दिन में ज़्यादा सोता है या स्कूल में उसे बार-बार नींद आती है, तो यह चिंता का विषय हो सकता है और इसकी जांच करानी चाहिए.”

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डॉक्टर वली के अनुसार इसका कोई सीधा इलाज नहीं है. ऐसे मामलों में परामर्श मददगार हो सकता है, जो आमतौर पर मनोविज्ञानी करते हैं. इसके अलावा पूरी नींद लेना भी ज़रूरी है.

उनका कहना कि रात के समय शरीर में मेलेटोनिन बनता है. अगर ज़रूरत हो तो डॉक्टर की सलाह से मेलेटोनिन दिया भी जा सकता है.

वह यह भी कहते हैं कि आम तौर पर इन स्थितियों में याददाश्त पर कोई असर नहीं पड़ता.

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