UP में सपा-कांग्रेस के गले की फांस बना धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा?

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) का आक्रामक पलटवार और विपक्ष के बीच श्रेय लेने की होड़ उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

NEET-UG पेपर लीक विवाद और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) व छात्रों के भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद 25 जुलाई 2026 को धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि सपा और कांग्रेस इस इस्तीफे को ‘युवाओं और इंकलाब की जीत’ बताकर आगामी यूपी चुनावों में भुनाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन जमीनी समीकरण उनके लिए “गले की फांस” बनते दिख रहे हैं।

सपा-कांग्रेस के लिए इस घटनाक्रम के गले की फांस बनने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. श्रेय लेने की आपसी होड़ (सपा बनाम कांग्रेस)

इस्तीफे के तुरंत बाद विपक्ष में इस बात का श्रेय लेने की होड़ मच गई है कि आखिर सरकार को झुकाने में किसकी भूमिका बड़ी थी। एक तरफ राहुल गांधी (कांग्रेस) इसे छात्र शक्ति का दबाव बताकर खुद फ्रंट पर रख रहे हैं, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव (सपा) इसे उत्तर प्रदेश (प्रयागराज, आजमगढ़, लखनऊ) के युवाओं के ‘सड़क पर उतरे इंकलाब’ का नतीजा बता रहे हैं। दोनों दलों के बीच यह आपसी प्रतिस्पर्धा गठबंधन की एकजुटता के नैरेटिव को कमजोर कर रही है।

2. बीजेपी का ‘डिफेंसिव’ के बजाय ‘आक्रामक’ रुख

बीजेपी इस मुद्दे पर बैकफुट पर जाने के बजाय उल्टा हमलावर रणनीति अपना रही है। बीजेपी नेताओं ने सपा और कांग्रेस के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को याद दिलाना शुरू कर दिया है।

  • सपा शासनकाल (जैसे 2013 और 2016) में TET और अन्य परीक्षाओं के अभ्यर्थियों पर हुए लाठीचार्ज और भर्तियों के विवादों को दोबारा हवा दी जा रही है।
  • बीजेपी इस इस्तीफे को अपनी “नैतिक ईमानदारी” और “छात्रों के प्रति संवेदनशीलता” के रूप में पेश कर नैरेटिव को अपने पक्ष में मोड़ने की जुगत में है।

3. मुख्यधारा के छात्र संगठनों (CJP) का स्वतंत्र रुख

इस पूरे आंदोलन को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और गैर-राजनीतिक छात्र संगठनों ने लीड किया था। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार द्वारा उनकी शर्तें मान लिए जाने के बाद छात्र इसका जश्न मना रहे हैं। चूंकि यह मुख्य रूप से युवाओं का अपना आंदोलन था, इसलिए विपक्षी राजनीतिक दलों (सपा-कांग्रेस) द्वारा इसका पूरा राजनीतिक माइलेज ले पाना आसान नहीं होगा।

4. सख्त कानून और सरकार का ‘डैमेज कंट्रोल’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पेपर लीक के खिलाफ फास्ट-ट्रैक कोर्ट और कड़े कानून (Draft Bill) लाने की घोषणा और शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों के तबादलों ने छात्रों के गुस्से को काफी हद तक शांत कर दिया है। सरकार के इस त्वरित एक्शन से विपक्ष के पास अब इस मुद्दे को लेकर ज्यादा समय तक घेराबंदी करने का मौका नहीं बचा है, जिससे यूपी चुनाव में युवाओं को पूरी तरह से गोलबंद करने का उनका प्लान अटक सकता है।

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