बसपा का बूथ चलो अभियान vs सपा का पीडीए… आखिर कौन-किस पर पड़ेगा भारी! कहां जाएगा दलित वोट बैंक? जानें

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अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में इस बात की होड़ मच गई है कि आखिर दलित वोट बैंक किसके साथ जाएगा. उत्तर प्रदेश में रहने वाले 22 फीसदी दलित वोट को लेने के लिए समाजवादी पार्टी अब बहुजन समाज पार्टी की नीतियों पर लगातार हमलावर दिखाई दे रही है.

लखनऊ: यूपी के सियासी गलियारों में आजकल लगातार हलचल मची हुई है. बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के निर्देशानुसार ‘बूथ चलो’ अभियान एक तरफ चल रहा है. वहीं, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी PDA को लेकर विधानसभा चुनाव की रणनीति बना रही है. बसपा के बूथ चलो अभियान बनाम पीडीए में कौन किस पर कितना भारी साबित हो सकता है? आइए समझते हैं…
बसपा सुप्रीमो मायावती बनाम सपा मुखिया अखिलेश यादव.
अगले साल यानी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में इस बात की होड़ मच गई है कि आखिर दलित वोट बैंक किसके साथ जाएगा. उत्तर प्रदेश में रहने वाले 22 फीसदी दलित वोट को लेने के लिए समाजवादी पार्टी अब बहुजन समाज पार्टी की नीतियों पर लगातार हमलावर दिखाई दे रही है. शायद यही वजह है कि अब बहुजन समाज पार्टी गांव-गांव जाकर अपने बूथ को सही करने की कोशिश कर रही है. वहीं समाजवादी पार्टी दावा कर रही है कि वह PDA के माध्यम से उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक को अपने साथ कर लेगी.
वरिष्ठ पत्रकार विजय उपाध्याय ने कहा कि मौजूदा समय में समाजवादी पार्टी का वोट शेयर बहुजन समाज पार्टी से काफी ज्यादा है. बहुजन समाज पार्टी एक तरफ जहां 10% वोट शेयर पर है, वहीं समाजवादी पार्टी उससे कई गुना ज्यादा वोट शेयर लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव में अपनी महत्ता को बता चुकी है. समाजवादी पार्टी कोई ऐसा मौका नहीं छोड़ना चाहती है, जिससे 2027 के विधानसभा चुनाव में वह कमजोर पड़े. मगर, पिछले कुछ महीनों में सबसे ज्यादा दलित वोट बैंक पर हमला किया है. बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी एक दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं.
बसपा सुप्रीमो मायावती बनाम सपा मुखिया अखिलेश यादव.
सपा प्रवक्ता फखरूल हसन का कहना है कि सपा PDA के माध्यम से उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक को अपने साथ कर लेगी. हालांकि, देखने वाली बात यह होगी 2027 विधानसभा चुनाव में बाजी कौन मारेगा हालांकि समाजवादी पार्टी लगातार भीमराव अंबेडकर और कांशीराम के नाम पर कार्यक्रम करती रही है. संविधान बचाने के नाम पर भी समाजवादी पार्टी यह दिखाने और बताने की कोशिश कर रही है कि बहुजन समाज पार्टी की तुलना में वह ज्यादा मजबूत स्थिति में है और समाजवादी पार्टी लगातार बहुजन समाज पार्टी के पुराने नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करती हुई दिखाई दे रही है.

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