इस वर्ष आगरा में ईरानी पर्यटकों के बिना नौरोज मनाया जा रहा है। इजरायल-ईरान युद्ध के कारण मार्च में ताजमहल देखने आने वाले बड़े ईरानी समूह नहीं आ पाए। ली पैसेज टू इंडिया टूर कंपनी के उपाध्यक्ष राजेश शर्मा ने बताया कि पहले महान एयर के कई चार्टर प्लेन आते थे। मुगल काल में भी नौरोज का उत्सव मनाया जाता था, जिसका जिक्र जहांगीर की आत्मकथा में है।

भारतीय नववर्ष विक्रम संवत्सर-2083 की शुरुआत गुरुवार को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के साथ हो गई। ईरानी नववर्ष नौरोज शुक्रवार को मनाया जाएगा। मार्च में नौरोज की छुट्टियों में ईरानी पर्यटकों के ग्रुप बड़ी संख्या में ताजमहल देखने आते थे।
इस बार ईरान के इजरायल व अमेरिका के साथ युद्ध में उलझे होने से ईरानी पर्यटक नहीं आ पा रहे हैं। नौरोज, ईरानी पर्यटकों के बगैर मन रहा है।
नौरोज ईरानी नववर्ष है, जिसे फारसी नववर्ष भी कहा जाता है। यह ईरानी कैलेंडर के पहले महीने फारवर्दिन का पहला दिन है। प्राचीन परंपराओं व संस्कारों के साथ नौरोज का उत्सव केवल ईरान में ही नहीं, बल्कि उसके पड़ोसी देशों में भी मनाया जाता है।
ली पैसेज टू इंडिया टूर कंपनी के उपाध्यक्ष राजेश शर्मा बताते हैं कि नौरोज के अवसर पर पूर्व में मार्च में ईरानी पर्यटकों के बड़े ग्रुप आगरा आते थे। ईरान की पहली निजी एयरलाइंस महान एयर के एक दिन में कई चार्टर प्लेन आया करते थे।
ग्रुप के अलावा अकेले यात्रा करना पसंद करने वाले पर्यटक भी आया करते थे। युद्ध के चलते इस बार ईरानी पर्यटकों के बगैर नौरोज निकल जाएगा।
जहांगीर ने आत्मकथा में किया है जिक्र
मुगल शहंशाह जहांगीर ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-जहांगीरी में लिखा है नौरोज पार्टी करने और उपहारों के आदान-प्रदान का अवसर था। शासनकाल के 14वें वर्ष में 21 मार्च, 1619 को उसने अपने बेटे शाहजहां द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया था। इसमें जहांगीर को कीमती उपहार भेंट किए गए थे।
इनमें गहने और शाहजहां द्वारा भेंट की गईं सुंदर वस्तुएं थीं। सर थामस रो ने मार्च, 1616 में जहांगीर के शासनकाल में नौरोज उत्सव का जिक्र किया है। डा. झारखंडे चौबे ने अपनी पुस्तक ‘मध्ययुगीन भारतीय समाज एवं संस्कृति’ में लिखा है कि मुगलकाल में एक ईरानी त्योहार का प्रचलन शुरू हुआ, जिसे नौरोज कहते हैं।
हुमायूं ने नौरोज मनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन नौरोज पर प्रीतिभोज का आयोजन होता रहा। औरंगजेब ने इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। उसने रमजान के बाद ईद-उल-फितर को शासकीय त्योहार का रूप प्रदान किया।
इतिहासविद राजकिशोर राजे ने अपनी पुस्तक ‘तवारीख-ए-आगरा’ में जहांगीर द्वारा सिंहासन पर बैठने के तीसरे वर्ष 1608 में रुनकता में नौरोज मनाने क

